Wednesday, 24 July 2013

मुझे काँटों पर प्यार आता है!

मुझे काँटों पे प्यार आता है
ना खिलने की चिंता, 
ना मुरझाने का डर
ना टूटने की चिंता, 
ना बिखरने का डर 
इन्हें अटल रहना आता है 
इसलिए मुझे काँटों पर प्यार आता है!!
ना धूप, ना छाँव का असर 
ना पानी ना हवाओं का असर 
इन्हें हर मौसम भाता है
इसीलिए मुझे काँटों पर प्यार आता है!!
ना कोई रंग ना कोई रूप 
ना ख़ुशी की चाहत ना ग़म से आहत
इन्हें कोई नहीं अपनाता है 
इसीलिए मुझे काँटों पर प्यार आता है
ना श्रद्धा मिलती,ना श्रधांजलि देता 
ना बालों में बाँधा जाता,
ना पैरों से रौंदा जाता 
इन्हें आत्मसम्मान की रक्षा करना खूब आता है 
इसीलिए मुझे काँटों पर प्यार आता है!!





8 comments:

  1. Hahaha.. to take a thorn as the central theme of your poetry and to build around it an aura of love and affection... that's a fantastic attempt, beautifully scripted and systematically rhymed. Good work! No, superb work, Shucheta! :)

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  2. सही कहा आपने!
    व्यक्तित्व की सम्पूर्णता के लिये उसमें पर्याप्त कांटे भी होने चाहियें, अन्यथा "टेकेन फॉर ग्राण्टेड" जैसी पर्सनालिटी होती है।

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  3. https://twitter.com/fakeerGandhi/status/382471876666077184

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  4. This comment has been removed by the author.

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