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Tuesday, 28 November 2023

भक्ति की शक्ति

 

यह है आस्था और भक्ति की शक्ति...
काशी में पूजन से, उत्तरकाशी में होती श्रमवीरों की मुक्ति
काशी विश्वनाथ, काशी के चरणों में
प्रज्वलित होते जब असंख्य दीप..
काशी विश्वनाथ, उत्तरकाशी में
उज्जवल होते 41श्रमिकों के जीवन-दीप
जब देव दिवाली मनी काशी की
निर्मल जलधारा के समीप...
पाषाण शीला का हृदय द्रवित हुआ
बाबा बौखनाग की भी कृपा हुई असीम
यह है आस्था और भक्ति की शक्ति...
काशी में पूजन से उत्तरकाशी में होती श्रमवीरों की मुक्ति
जो सनातन के मर्म व भक्ति की महिमा हैं समझते,
भारत की धर्मध्वजा, सुरक्षित है ऐसे ही करकमलों में!
#UttarakhandTunnelRescue #UttarkashiTunnelRescue
Link-https://www.facebook.com/groups/Sulekhni/permalink/6828173690607887/?mibextid=Nif5oz

Friday, 31 July 2015

देव वंदना

भगवन पुरातन पुरुष हो तुम, विश्व के आधार हो,
हो आदिदेव, तथैव उत्तम धाम, अपरम्पार हो।।
ज्ञाता तुम्ही हो, जानने के योग्य भी, भगवंत हो,
संसार में, व्यापे हुए हो, देव देव अनंत हो।।
तुम वायु यम पावक वरुण एवं तुम्ही राकेश हो,
ब्रह्मा तथा उनके पिता भी, आप ही अखिलेश हो।।
हे देव देव, प्रणाम देव, प्रणाम सहस्त्रों बार हो
फिर फिर प्रणाम, प्रणाम नाथ, प्रणाम बारम्बार हो।।
सानंद सन्मुख और पीछे से प्रणाम सुरेश हो,
हरि बार बार प्रणाम, चारों ओर से, सर्वेश हो।।
है वीर्य शौर्य अनंत बलधारी, अतुल बलवंत हो,
व्यापे हुए सब में, इसीसे सर्व हे, भगवंत हो।।
अच्युत हंसाने के लिए, आहार और विहार में,
सोते अकेले, बैठते सब में किसी व्यवहार में।।
सबकी क्षमा हम मांगते, जो कुछ हुआ, अपराध हो,
संसार में तुम, अतुल अपरम्पार, और अगाध हो।।
सारे चराचर के, पिता हैं आप, जग आधार हैं,
हैं आप, गुरुओं के गुरु, अति पूज्य और महान हैं।।
त्रैलोक्य में, तुमसा प्रभु, कोई, कहीं भी, हैं नहीं,
अनुपम अतुल्य प्रभाव बढ़कर, कौन फिर होगा कहीं।।
इस हेतु वंदन, योग, ईश शरीर चरणों में किया,
हम आपको,करते प्रणाम प्रसन्न करने के लिए।।
ज्यों तात सुत के, प्रिय प्रिया के, मित्र सहचर अर्थ हैं,
अपराध मेरा, आप त्योंही, सहने हेतु समर्थ हैं..
अपराध मेरा आप त्योंही सहने हेतु समर्थ हैं।।

Tuesday, 17 September 2013

आराध्य


नयनो में  दीप्त होते अटल अमर दो तारे 
जो कहते हम पा सकते लक्ष्य हमारे 
अधरों पर छाती है जब निर्मल निश्छल मुस्कान 
वो मिटा देती है जीवन श्रम की कातरता व थकान 
विचारों में है आथाह सगर सी गंभीरता 
जो हरती मेरे चंचल चपल मन की अधीरता
वाणी से छलकता वो हृदय के भीतर का विश्वास 
जो दूर करता संदेह व जीवन के उच्छ्वास 
दर्श में सिमट आती वसुधा की खुशियाँ सारी 
जो अनुभूति कराती है वात्सल्यपूर्ण  है सृष्टि हमारी

व्यक्तिव में है एक  अद्भुत (अदभुत ) चुम्बकीय  आकर्षण 
जो हृदय में हमारे करता उनके प्रति श्रद्धा उत्पन्न 
यदि मुझसे कोई पूछे कि कैसी होगी 
तुम्हारे आराध्य की सजीव मूरत 
तो पता है मुझे, प्रकट होगी नयन पटल पे 
उनकी ही अटल, अमर नयनाभिराम मूरत!!

Thursday, 8 August 2013

ये वक़्त नहीं,सोने का!!



क्या भारत "कुछ" लोगों का है??
क्या वक़्त अभी सोने का है??
हम दर्द अगर महसूस करें,
पीड़ा सेना की, समझ सकें...
तो खुद को रोक ना पायेंगे
और बात समझ ही जायेंगे
यह मौत का खेल, यूँ वीरों से,
आतंकी करे...या पाक करे…
यह वीर हमारे अपने थे
भारत माँ के रत्नों में थे 
कुछ नेता कहते-"शांत रहो
और गीत मैत्री के गाते रहो... 
यूँ ही वीरों को लुटाते रहो... 
हम गीत मैत्री के गायेंगे
खुद शांतिदूत बन,
भारत माँ के बेटों की,भेट चढ़ायेंगे"
बहता जो खून रगों में है,
खून नहीं है... पानी है...
सत्ता लोलुप लोगों के लिए,
ये बस हार जीत की कहानी है... 
जीवन का क्या?? लुट जाने दो..
सत्ता ना उन्हें गवानी है... 
अब डोर छीन लें इनसे हम 
अस्मत भारत माँ की बचानी है…
जो जान शहीदों ने दी है
वो भेट नहीं, कुर्बानी है...
अमन की झूठी आस नहीं 
ज्योत सरफरोशी की दिलों में जलानी है...
ये  देश नहीं "कुछ" लोगों का
ये वक़्त नहीं अब सोने का!!


  






Saturday, 22 December 2012

निष्क्रियता त्यागो!!

Recent cartoon by Sudhir Tailang ji


निष्क्रियता त्यागो!! शासकों जागो !!! 

आज फिर से "मौन-व्रत" टूटा,
कहा-"ऐसा अपराध ना हो दोबारा!!"

हम कोई ठोस कदम नहीं उठायेंगे 
हम कोई कानूनी संशोधन नहीं लायेंगे 
मांगेंगे इन्साफ संसद में-चीख-चीख कर 
पर, ऐसे अपराधो के खिलाफ,आवाजों को दबायेंगे 
और फिर सरकार में बैठ चिल्लायेंगे - ऐसा  अपराध ना हो दोबारा!!
जन चेतना को, जन आक्रोश को 
विद्रोह बताकर, लाठियां बरसाएंगे 
आंसू गैस के गोले चलाएंगे 
जन प्रतिनिधि होते हुए भी 
जनता की भावनाओ को ना समझने का, ढोंग रचाएंगे!!
जब जनता के हाथ पैर टूट जायेंगे,
हम एक बैठक कर उनके नेता से मिलने की झूठी आस जगायेंगे !!
ऐसे अन्दोलन का कोई नेता ना पाकर मन ही मन मुस्कुराएंगे 
और फिर सरकार में बैठ चिल्लायेंगे - ऐसा  अपराध ना हो दोबारा  !!
अबला, कह कहकर नारी को सहमायेंगे 
जगह जगह सिर्फ कैमरे लगायेंगे 
और अपराध हो ने के बाद
अपराधियों को पकड़ने की वीर गाथाये गायेंगे!
कोई पुख्ता कानून ना लायेंगे 
जब अपराधी बेल पर छूट जायेंग,
हम  फिर सरकार में बैठ चिल्लायेंगे - ऐसा  अपराध ना हो दोबारा  !!
कहो तो, पीड़ित का बार बार पुलिस बयान करवाएंगे 
उसके परिवार के,मन में, कानून के लम्बे चक्करो का डर बैठाएंगे! 
न्याय के मंदिर कहे जानेवाले न्यायालो में बैठे
न्यायाधीशों के हाथ बांध-उन्हें बस पूजनीय मूरत बनायेंगे!
कोई फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट नहीं बनायेंगे
पीड़ित की वर्षों चप्पलें घिसवायेंगे 
पीड़ित का अगर आक्रोश फूटा 
तो उसी पे,न्यायलय व देव तुल्य न्यायाधीशों की 
अवमानना का केस चलाएंगे !!
और जब अपराधी पीड़ित की विवशता पे मुस्कायेंगे 
हम फिर सरकार में बैठ चिल्लायेंगे - ऐसा अपराध ना हो दोबारा  !!
यूँही चलता रहेगा क्रम,सोच सोच महलों में गर बैठे नेता, इठालायेंगे 
वो दिन दूर नहीं जब जनता गद्दी छीन 
स्वयं के, सामाजिक और नियम-कानून बनाएगी 
ऐसी रुत में, वो दिन दूर नहीं जब  ऐसी व्यवस्था चर्मराएगी 
कि कोई लाठी, कोई बन्दूक,कोई इमरजेंसी,  

उन्हें ना रोक पाएगी !!
इससे पहेले शासको जागो , समाज के ठेकेदारों जागो !!
अपनी यह निष्क्रियता त्यागो!!
लाओ मिलकर कानून ऐसा जिससे,
फिर कलंकित न हो भारत माँ का चेहरा !!
लाओ मिलकर ऐसी कानून व्यवस्था,
जिससे अपराधियों के मन में हो भय घनेरा !
और फिर सब मिलकर दोहराएंगे :-
भारत माँ के आँचल में सुरक्षित है हर नागरिक, हर अबला !!
हमारे सभ्य समाज में होगा नहीं, ऐसा अपराध फिर दोबारा !!
कहना नहीं पड़ेगा फिर यूँही, दिखावे के लिए 
"ऐसा अपराध ना हो दोबारा!!"

Sunday, 16 December 2012

"संतोष"


इंसान है आज बहका-बहका 
"संतोष-धन" है वो खो बैठा!!
विलास के साधनों से 
हैं आँखें, उसकी यूँ चुन्धियाई 
बिना सोचे ही, इस तृष्णा का 
बन गया है, वो अनुयायी !!
मद की मदहोशियों से 
वो यूँ आकर्षित हुआ 
की उसने, अपने चातुर्य
को भी है खो दिया !!
अभिमान का अँधेरा है 
उसपे ऐसा छाया 
कि स्वाभिमान की वाणी 
भी, वो सुन न पाया !!
कृत्रिमता के पटल ने है 
उसकी आँखों को यूँ छुपाया 
की सत्य- असत्य में 
वो भेद ना कर पाया !!
लोभ लालच ने इतना 
उसे है निर्मम बनाया 
कि औरों की  भावनाओ को 
वो समझ नहीं पाया !!
झूठ की धुंध ने 
है उसे चारों ओर से घेरा 
की दिखला न सका 
सत्य-पथ उसे कोई सवेरा !!
ईर्ष्या की रज में आता है 
नज़र वो सना हुआ 
आज प्रीत की धुन को भी 
है उसने भुला दिया !!
काश वो देख पाता 
आया है नज़र,उसे जो रेशम 
वो तो है,काल के मायाजाल  का रेशा !!
काश वो जान जाता   
जिन मानवीय-भावनाओ(सत्य,संतोष ,सय्यम) को,
समझने लगा है, वो अवरोधक 
वही हैं जीवन-सार, और यथार्थ 
वो ही है "पथ-प्रदर्शक" 
वो ही है-"लक्ष्य" मानवता का!!


Friday, 19 August 2011

विद्रोह नहीं.. क्रान्ति है..जूनून है ये.. अब तो,मान ही लो भीड़ नहीं जनमत.. जन-समूह है ये..!

गुस्ताख आवाजो... गुस्ताख  निगाहों...अब तो मानना होगा...
विद्रोह  नहीं... क्रान्ति  है ये...जूनून  है ये...
अब तो चिर निंद्रा त्यागो.. अब तो शासकों जागो...
विद्रोह  नहीं.. क्रान्ति है....जूनून  है ये...
भीड़ नहीं.. देश-की-आवाज़ और जन-समूह है ये...!


तोलते ही रहे वो..सिक्को में, रुपये पैसों में,
मातृभूमि के प्रति हमारे श्रद्धा-विश्वास को...
ढूंढते ही रहे वो, प्रायोजकों को...
सियासती गलियारा नहीं कोई...
मातृभूमि पे न्योछावर होने का प्रण है ये...
अब तो चिर निंद्रा त्यागो.. अब तो शासकों जागो...
मान भी लो भीड़ नहीं जनमत... जन-समूह  है ये...    

जो उबल रहा... जो बह उठा...रगों में आज... 
पानी नहीं... देश-प्रेम का सच्चा-खून  है ये...
बेईमानी नहीं...लोभ...लालच...स्वार्थ नहीं...
देश के लिए कुछ कर गुजरने की, आस है ये...
अब तो चिर निंद्रा त्यागो.. अब तो शासकों जागो...
विद्रोह  नहीं... क्रान्ति है...जूनून  है ये...
भीड़ नहीं जनमत... जन-समूह  है ये...

पैरों  तले कुचलने का प्रयत्न करनेवालों... 
याद रखना फूल नहीं...कांटे है ये...विचारों की तलवारें है ये...
भूले से भी,अब न कहना-क्रांति नहीं विद्रोह है ये...
फिर ना दोहराना-नासमझों की टोली है ये...
जनता नासमझ और भोली है ये...
मान भी लो भीड़ नहीं जनमत... जन-समूह  है ये..

दीप की शिखा नहीं,जो बुझा लोगे फूँक से 
दहकते अंगारे दिलों में है ...चिंगारी है ये...
भूल से भी दे-देना ना हवा कहीं ,
लेलेंगी प्रचंड ज्वाला का रूप ये...
जल उठेंगे कृत्रिम आडम्बर व सियासती सिंघासन
फिर ना दोहराना- क्रांति नहीं विद्रोह है ये...
फिर न कहना नासमझों की टोली है ये...
ना ही कहना-भोली जनता कि बड़ी कोई भूल है ये...
मान भी लो भीड़ नहीं जनमत... जन-समूह  है ये...

अब तो चिर निंद्रा को त्यागो.. अब तो जागो...
मान भी लो!! देश के भ्रष्टाचारियों व गद्दारों...!!
विद्रोह नहीं... क्रान्ति है ये...जूनून  है ये...
सड़को पे जो उतर आया है आज ...जनाक्रोश है ये...
फिर न कहना नासमझों की टोली है...
भीड़ नहीं..स-उद्देश ससंदेश शांतिपूर्ण जनांदोलन और जन-समूह है ये...
विद्रोह  नहीं.. क्रान्ति है...जूनून है ये... 
मान ही लो भीड़  नहीं जनमत.. जन-समूह  है ये..!!-शुचिता वत्सल 

This is poem that I wrote and which spontaneously came to my mind when I saw the spectacular picture of Awakened India on my Television screen..
Vandematram!!
-Shuchita Vatsal.





Friday, 22 July 2011

"कोशिश" ----:(शुचिता वत्सल)

शिखर तो छू लिए होते 
गर गगन की कल्पना की होती,
गागर तो भर ही जाती 
गर सागर की अभिलाषा करी होती,
फूल तो मिल ही जाते 
मधुबन  की कामना की होती,
पगडण्डी भी पा ही लेते 
गर मंजिल की रहे खोजी होती ,
कुटिया तो बन ही जाती
गर महलों की इच्छा की होती,
तारा तो पा ही लेते गर 
चाँद की आकांक्षा रखी होती,
दीप की ज्योति मिल ही जाती 
गर दिनकर की किरणें चाही होती,
नन्हा तृण तो पा ही लेते 
गर नीड़ की आशा की होती ,
हम भी मंजिल पा जाते 
अगर "कोशिश की होती" !!




आहूति (Aahooti) by Shuchita.

प्रेम को नफरत में बदल देता है यह जहाँ ,
जिस हृदय की भूमि पर विश्वास उपजता हो
शक के बीज बो देता है ये वहां |
श्रद्दा के मंदिर में ,
प्रेम के अमृत में ,
अविश्वास का  ज़हर मिला देता है ये जहाँ,
जीने का सहारा,
दिल का सकूं,
सब तो छीन लेता है ये कठोर जहाँ !
प्रेम को क्रोध का रूप देना,
आस्था को डिगाना ,
रिश्तों को व्यापार बतलाना 
सभी में पारंगत है ये जहाँ !
कुछ करना है तो दुनिया दारी के खेल में न फसें  
स्वयं को,स्वयं के अहम को, निष्ठा की ज्वाला में आहूत करें
तभी श्रद्दा , विश्वास , आस्था के बंधन निभा पाएंगे 
तभी मानव जीवन को सबल व समर्थ बना पाएंगे !



Sunday, 3 July 2011

VISHWAS...by Shuchita

                                                                        Vishvaas

कृत्रिमता के बदल छाये चारों ओर 
समाज कहता मनो निशा को भोर 
जीवन जीना है तो, झुकना सीखो !
सफ़र करना है तो रुकना सीखो !
परम्पराओं के दायरे से बाहर,ना निकलो !
पूर्वजों के पदचिन्हों पर चलना सीखलो!
           पर क्या .......?
           इस विचारधारा के अनुरूप ढल सकोगे ?
           चुप  रह  इन  कुरीतियों को यूँ ही सहोगे ?
           कायरता  को जीवन में, सम्मलित करोगे ?
           और  यूँ ही जीवन बिता कर चले जाओगे ?
है, परिवर्तन है जीवन में है ज़रूरी 
रिश्तों, समाज, रूड़ियों को ना बनाओ मजबूरी 
संदेह रहा है सदा से मानव प्रगति की कमजोरी
मिटा डालो ये भ्रम व अपने और अपनी मंजिल के बीच की दूरी 
             माना देगा ना साथ कोई तुम्हारा,
             माना कोई ना होगा, मार्गदर्शक तारा 
             होगा बस तुमपे सिर्फ "आपसी-विश्वास" का सहारा 
             लक्ष्य प्राप्ति कराएगा सिर्फ "आत्मविश्वास" तुम्हारा !
तब ये ही  असमर्थक गायेंगे 
तुम्हारी  जय-गाथा 
तभी संतुष्ट होगा हृदय
ऊंचा होगा गर्व से ये माथा !!

Wednesday, 3 November 2010

"Viniti"







हूँ मैं मृदु रेणु 
हो शिल्पकार तुम मेरे 
मेरे व्यक्तित्व निर्माण के 
हो आधार तुम मेरे 
तुम्हीं पर है निर्भर 
आकार देते तुम क्या मुझे 
दे स्वयं का निर्मल स्पर्श 
चाहे बनाओ मुझे आराध्या की मूर्ति 
या फिर प्रियतमा की छवि 
या प्रदान करो कोई जीवंत आकृति 
मेरे निर्माण में छुपा शिल्प तुम्हारा 
ना दिखलायेगा मेरी प्रवृत्ति 
वो दिखलायेगा सिर्फ तुम्हारी मनोवृत्ति 
मैंने तो ग़ैरों की कल्पना के 
अनुरूप ढालना सीखा 
मैंने तो औरों के सपनों 
को साकार करना सीखा 
मेरा अस्तित्व तुम्हीं पर है निर्भर 
ना करना मेरी प्रतिभा का तुम निरादर 
तुम्हारी कला का पा सहरा 
मैं करूँगी सपना साकार तुम्हारा 
वहीं तुम्हारा क्रूर स्पर्श 
करेगा मेरी मनोरम छवि भी ध्वस्त 
मेरी सिर्फ है एक विनति
चाहे प्रदान करना या 
ना करना तुम्हारी प्रीति 
पर केवल कहना मुझसे 
तुम्हारे हृदय के भीतर का तथ्य
व मन में छुपा हर एक सत्य। 









 A poem close to my heart - I wrote this few years back.. This has request of a girl to her dream partner...Please read & post your comments..