"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः "
लोकतंत्र को और मजबूत बनाने के लिए विधायी संस्थाओं में नारी शक्ति का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना अत्यावश्यक है।
नारी तू नारायणी...
नारी है शक्ति स्वरूपा...
नारी है जगतजननी ये हम सुनते आए हैं...
इस बात में कोई दो राय नहीं कि अगर सुसंस्कृत, सुशिक्षित, संकल्पित, राष्ट्र के प्रति समर्पित, सक्षम, दायित्व बोध से परिचित नारी को समस्याओं का समाधान ढूंढने का अवसर मिलेगा तो, वह अवश्य ही स्वर्णिम इतिहास रच देगी।
आरक्षित होना मुझे कभी भी समानता का आधार नहीं लगता पर अगर सामाजिक परिस्थितियों की वजह से आरक्षण का सहारा लेना ही पड़े, तो प्रतिनिधित्व करने का अवसर उन शक्ति स्वरूपाओ को मिलना चाहिए- जिनकी शक्ति और सामर्थ्य को, संस्कारों के बोध से, वह स्वयं मर्यादित करना जानती हो। मात्र कुतर्क कर स्वातंत्र्य की बोली ना बोले, अपितु सर्व समाज के लिए जिसके हृदय में ममत्व हो, जो स्वच्छंदता और स्वतंत्रता में भेद करना भलीभांति जानती हो।
जो अपने gender को नहीं अपितु, अपनी योग्यता को किसी भी स्थान को पाने का साधन समझे। जिसे यह पता हो कि पद अथवा सामर्थ्य को पाने के बाद निष्पक्षता, निडरता और निश्चल भाव से जन प्रतिनिधित्व करना, उसका दायित्व है।
आधी आबादी नहीं वह संपूर्ण समाज का कल्याण करने हेतु अपने सामर्थ्य का प्रयोग करे। जिसमें निर्णय क्षमता हो, जो दायरों को पुन: परिभाषित करना जानती हो, जिसमें नयी राह गढ़ने की क्षमता हो पर, सिर्फ इसलिए लीक से परे नहीं सोचे या कहें, क्यूंकि उसे बंधन मुक्त होना है। बल्कि इसलिए सोचे या कहें क्यूंकि उसे लगता हो कि यह आनेवाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर समाजिक परिवेश देने में सहायक होगा।
जिसे जीवन के कटु सत्य का अनुभव हो पर कुंठा और द्वेष भाव, जिसके हृदय मे घर ना कर पाया हो।
प्रत्येक व्यक्ति अद्वितीय, अद्भुत और अनोखा है। हर नारी को स्वयं पर गर्व होना चाहिए पर, अहंकार नहीं।
सहारा ना लेना उसका उद्देश्य हो जब तक कि परिस्थितियों को वो स्वयं सम्भाल सके, पर विचारों के आदान-प्रदान और परामर्श का मार्ग सदैव खुला रखना होगा। नारी और पुरुष कोई शत्रु नहीं अपितु समाज के दो ध्रुव हैं, जिनके परस्पर सहयोग से सामाजिक सौहार्द बना रहता है। शिव और शक्ति, श्रीकृष्ण और रुक्मिणी जी, माता सीता और प्रभु श्री राम, श्री हरि और माँ लक्ष्मी.. हमारी अध्यात्मिक चेतना में, दोनों- स्त्री और पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं, सहयोगी हैं। किसी भी प्रतिस्पर्द्धा के द्योतक नहीं।
जो नारी किसी की पुत्री, पत्नी, मित्र, संबंधी होने का सहारा ले अपने सामर्थ्य को प्रदर्शित करने की पहली सीढ़ी न बनाए, ऐसी होनी चाहिए जनप्रतिनिधि। किसी परिवार का होना, गलत नहीं, पर योग्यता के आधार पर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा करने का माद्दा होना चाहिए।
अगर स्वयं को मातृशक्ति कहलाना अच्छा लगता है, तो माँ भगवती सी शक्ति, समझ, सहनशीलता, क्षमा करने की क्षमता और अपने प्रत्येक निर्णय पर अडिग रहने की कला और पराजय को स्वीकारने की शक्ति होनी चाहिए।
निर्णय के पीछे आवेश नहीं अपितु पुख्ता कारण हो और जिसे संपूर्ण ब्रहमांड के समक्ष निडरता और आत्मविश्वास के साथ अकेले प्रस्तुत करने का नारी में साहस हो।
निर्णय सही या गलत हो सकते हैं पर स्वार्थ से, द्वेष से, भय से प्रेरित नहीं होने चाहिए, निर्णय सदैव समग्र चिंतन तथा उसकी परिणति के पाश्चात्य होनेवाले परिवर्तनों को अपनी क्षमता के अनुरूप तोलने के पश्चात लेने चाहिए।
विधायिका (राजनीति) कोई आजीविका अथवा सामाजिक प्रतिष्ठा पाने का साधन नहीं बल्कि सेवा करने का माध्यम है।
पर यहाँ सेवा और राष्ट्र के प्रति समर्पण को परिभाषित करना अत्यंत अवश्यक है, अगर सामाजिक दायित्वों से विमुख होकर, अपने सांसारिक धर्म का निर्वहन न करने को, कोई समर्पण समझने की भूल करे तो, वो अवश्य ही मातृभूमि का ऋण लेकर इस संसार से जाएगा।
कोई अगर इस धरा पर आया है तो उसे षोडश कलाओं में निपुण होने की पूर्ण कोशिश करनी चाहिए।
संपूर्णता बिना, स्वतंत्रता किसी भी मार्ग पर, सांसारिक व आध्यात्मिक मार्ग मे अग्रसर होने के लिए प्रयाप्त नहीं।
साध्वी की भांति सेवा करनी है, तो समस्त भोग विलासिता के साधनों का परित्याग कर, चका चौंध और छपास-दिखास से परे होना होगा और अगर आज के परिवेश में यह सम्भव नहीं तो प्रत्येक सांसारिक दायित्व का निर्वहन कर, अपने समय का सदुपयोग कर, स्वयं को निर्लिप्त रखते हुए कार्य/ सेवा करेंगे, तो सन्यासी से ज्यादा गृहस्थ रह, जीवन में वैराग्य प्राप्त कर, मुक्ति मार्ग पर अग्रसर होंगे।
सेवा--दान नहीं, स्पर्श नहीं, सेवा यथासम्भव सहायता करना तो है ही, पर सेवा वो है जो आनेवाली पीढ़ियों का भविष्य सुनिश्चित कर सके। सामजिक परिकल्पना को सुदृढ़ कर सके।
समाज के प्रति समर्पित सेवाभावी व्यक्ती पर समाज को इतना विश्वास होना चाहिए कि वह सुनेगा और जो उत्तम से उत्तम कर सकता होगा, वो करेगा।
आरक्षण के बाद भी अगर सरपंच-पति, पार्षद-पति, विधायक-पति सत्ता की बागडोर संभालेंगे तो यह सही मायने में प्रभावशाली नहीं होगा। जिसे पदभार मिले, वहीं उस कार्य को, अपनी समझ से करे, न कि कोई दूसरा।
अगर जीवन के एकाकीपन को दूर करने के लिए हम भीड़ में हैं और स्वयं को समाजसेवी समझ रहे हैं तो यह हमारी बड़ी भूल है। कोई भी कार्य दायित्व निर्वाह करते हुए भी, हमारे सीमित समय और साधनों मे प्राथमिकता हो, तो हम उसके प्रति समर्पित है, अन्यथा वो मात्र एक विकल्प है, संकल्प नहीं। और जो कार्य "संकल्प नहीं हो" तो समय व्यतीत होने और परिस्थितियों के बदलने के साथ बोझ लगने लगता है और मैं मानती हूँ कि नारी को अधिकार प्राप्ति की चाह में, किसी बोझ के नीचे दबने की, कोई अवश्यकता नहीं। जीवन में किसी भी कार्य का चयन करना हो तो, विचार करने के बाद जो अंतःकरण को ठीक लगे उसे चुने, चाहे उस राह में अग्रसर होने के लिए कोई आपको प्रोत्साहित करे या नहीं। मार्ग और दिशा चुनने के पश्चात् लौटने की या मुड़कर पीछे देखने की अभिलाषा लक्ष्य प्राप्ति में बाधक होती है। इसलिए जैसे अर्जुन ने मछली की आँख के लक्ष्य को साधा था वैसे ही प्रत्येक जीवन लक्ष्य को साधना चाहिए। चाहे वह सेवा हो या समाज में अपनी भूमिका निभाना या फिर मातृभूमि एवं सामाजिक ऋणों को चुकाने का प्रयास।
नारी का प्रतिनिधित्व मात्र महिलाओं के लिए नहीं, समस्त समाज और संसार के लिए होना चाहिए।
अगर ऐसे सुदृढ़ विचार, परिपक्व मानसिकता और सांसारिक शिष्टाचार की समझ वाली नारी को प्रतिनिधित्व मिलेगा, तो निःसंदेह समाज का कल्याण होगा।
ऐसी नारी को सामाजिक, आर्थिक, प्रशानिक शक्ति मिलेगी तो निसंदेह ही हमारे विकसित भारत के लक्ष्य की प्राप्ति में वो गति लाएगी और भारत माता का वैभवशाली इतिहास पुनः स्थापित होगा।
नारी आरक्षण गर बैसाखी नहीं अपितु स्वयं की क्षमताओ को संपूर्णता देने का माध्यम है और उससे अगर योग्यता के आधार पर बेटियों को अवसर मिलेगा तो हमें इसका पूर्ण समर्थन करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए।